Работа пионера

«Зулейха открывает глаза»: в зоне комфорта

Татьяна Шершнева Татьяна Шершнева
13 июня в 09:39
 
Рецензия  на:  
Яхина,  Гузель  Шамилевна.  Зулейха  открывает  глаза:  [роман]  АСТ:  Редакция  Елены  Шубиной,  Москва,  2015.  ISBN:  978–5–17–090436–5
 
  При  всех  его  лежащих  на  поверхности  недостатках  этот  «сырой»  текст  весьма  и  весьма  любопытен.  Кажется,  издатель  поступил  достаточно  мудро,  оставив  в  нем  «все  как  есть»,  сохранив  его  первоначальное  очарование  как  «языковой  игры».  Жюри  же  «Большой  книги»,  выставив  роман  на  полки  магазинов  в  одном  ряду  с  достойными  литературной  канонизации  произведениями  Е.  Водолазкина  и  Л.  Юзефовича,  привлекло,  таким  образом,  многочисленную  требовательную  читающую  аудиторию  к  этому  в  высшей  степени  интересному  тексту,  вызвавшему  массу  споров  и  самых  разных,  в  том  числе  противоположных  оценочных  суждений.

  1930  год.  В  Стране  Советов  в  разгаре  процесс  раскулачивания  крестьянства.  В  татарский  поселок  Юлбаш,  где,  истерзанная  домочадцами  (мужем  и  свекровью),  проживает  главная  героиня  романа  Зулейха  Валиева,  в  очередной  раз  приходит  продразверстка.  Командир  Игнатов  случайно  убивает  мужа  Зулейхи,  возвращающегося  с  кладбища,  где  в  могиле  одной  из  дочерей  тот  с  помощью  жены  утаивал  посевное  зерно  от  молодого  Советского  государства.  Зулейху,  как  жену  раскулаченного,  этапируют  санями,  поездом  и  баржой  в  Сибирь  на  поселение,  где  она  рожает  сына,  растит  его,  работает  на  кухне,  санитаркой  в  лазарете,  охотится  в  тайге  и  страстно,  но  в  большей  части  повествования  тайно  любит  (взаимно)  красноармейца  Игнатова,  непреднамеренно,  но  вынужденно  и  исключительно  по  обстоятельствам,  ни  в  какой  мере  от  него  не  зависящим,  во  все  время  сопровождающего  ее  как  должностное  лицо,  с  тех  самых  пор,  как  они  повстречались  по  дороге  с  кладбища,  где  убитый  им  муж  Зулейхи  с  ее  помощью  утаивал  от  молодого  Советского  государства  посевное  зерно.

  Эпоха,  история  –  ничего  этого  в  действительности  здесь  нет.  Исторические  события  в  романе  не  переходят  в  контекст,  оставаясь  не  более  чем  брезжущим  на  отдалении  фоном.  «Все  катится  мимо»  героини  «в  саму  преисподнюю»,  а  ей  словно  бы  того  и  надо:  первая  глава  посвятила  нас  в  столь  «ужасающие»  подробности  ее  замужества,  что  читаешь  и  радуешься,  как  ее  путь  на  каторгу  приносит  ей  все  большее  и  большее  облегчение.  Поездка  в  холодном  вагоне,  до  отказа  набитом  голодными,  но  очень  добрыми  людьми,  похожа  на  немного  затянувшийся  вояж.  «Названия  городов,  поселков  и  станций  нанизываются  друг  на  друга,  как  бисер  на  нитку»,  небольшой  дискомфорт  доставляет  голод:  «Зулейха  смотрела,  как  в  крошечном  прямоугольнике  зарешеченного  окна  пролетала  мимо  чужая  жизнь  –  редкие  лесочки,  сползшие  с  пригорков  деревеньки,  мятые  ленты  речушек,  скатерти  степей,  щетки  лесов  –  и  забывала  про  голод.  А  на  стоянках  вспоминала  опять»;  но  –  кормят  и  подкармливают,  ведут  разговоры  душевные  –  «не  то  рассказы  о  медицинской  практике,  не  то  обрывки  диагнозов»,  звучат  и  стихи,  и  –  Mon  Dieux!  –  французская  речь.  Пересадка  на  баржу  –  ей  некомфортно  в  трюме,  откуда  ее  незамедлительно  вывели  и  «так  и  оставили  на  палубе.  Весь  день  она  просидела,  прислонившись  спиной  к  стене  кубрика  и  глядя  на  плывущие  мимо  хребты  зеленых  холмов  в  неровной  щетине  сосен  и  елей.  Густые  здесь  леса,  темные.  Да  и  не  леса  вовсе  –  урманы.  Часовой  принес  из  трюма  ее  узел  с  вещами,  и  на  ночь  она  укрылась  своим  зимним  тулупом  –  ночи  стояли  прохладные,  зябкие,  несмотря  на  август».

  Стремительно  редеют  ряды  этапируемых:  побег,  стоянка  –  вновь  чья–то  смерть,  но  страха,  ужаса  (Боже,  что  происходит?)  нет,  а  в  полупустом  вагоне,  знаете,  дышится  легче:  «Зулейха  смотрит  в  черноту  потолка.  Мысли  текут  вслед  за  стуком  колес.  За  дощатой  стенкой  проносится  мимо  теплая  майская  ночь.  Легкий  полупустой  вагон  раскачивается  непривычно  ходко,  широко  –  как  колыбель.  Все  уже  спят  –  и  добрая  Изабелла,  полночи  гладившая  ее  по  руке,  и  чудак–профессор,  долго  смотревший  на  нее  светлыми,  радостными  глазами.  Уснуть  бы  и  ей  –  да  не  спится».  Добрый  путь  в  новую  жизнь  в  зоне  комфорта.

  Смерть  омывает  Зулейху,  «как  волны  –  остров»,  все  потери  «проплывают  мимо,  уносятся  вслед  за  всадником  в  остроконечной  буденовке».  После  смерти  мужа  «она  неподвижно  сидит,  сложив  руки  на  коленях»,  и  так  и  остается,  фигурально  выражаясь,  «сидеть»,  вытянув  ножки,  всецело  полагаясь  на  волю  всевышнего,  т.е.  автора,  который,  избавив  Зулейху  от  мужа  и  свекрови  и  войдя  во  вкус,  то  и  дело  проникает  взглядом  в  будущее  персонажей  и  раздает  им  гибель  направо  и  налево  щедрой  рукой. 

  Кусок  отравленного  сахара,  который  Зулейха  везла  с  собой  всю  дорогу  «в  кармане  кульмэк»  –  «ее  собственная,  единственная,  высшим  мановением  ниспосланная  смерть»  –  «маленькая,  сладкая,  нежно  и  призывно  пахнущая  чем–то  горьким»:  смерть  легкая,  быстрая,  как  у  мышонка,  приложившегося  к  куску  и  сразу  сдохшего  тут  же,  на  подоконнике.  Все  остальные  смерти  «не  касались  ее,  обходили,  облетали  стороной:  вокруг  сходили  с  ума  и  умирали  люди  –  кто  от  болезней,  кто  от  голода;  лежали  вдоль  дорог  и  провожали  их  вагон  застывшими  взглядами  мертвецы  из  других  эшелонов»,  а  «Зулейха  все  жила».

  Если  поначалу  авторский  произвол  забавляет,  то  постепенно  от  него  начинает  коробить.  Массовая  гибель  –  «естественная  убыль»  на  языке  красных  скотоводов,  за  которую  с  них  «никто  не  спросит»  и  не  спрашивает.  «Восемь  сотен  имен  разбросаны  по  кривоватым,  бесшабашно  пляшущим  по  листкам  столбцам.  Так  же  весело,  враскос,  бегут  и  черные  карандашные  линии,  перечеркивающие  более  половины  фамилий.  В  полутьме  у  костра  листки  напоминают  мелко  вышитые  полотенца».  В  чем  усматривает  автор  «веселье»  и  «бесшабашность»  на  листках  комендантской  папки  «Дело»,  –  не  понятно,  ведь  сам  комендант  Игнатов,  «водя  углем  по  ветхим,  до  сальности  затертым  листам,  старается  не  смотреть  на  фамилии»,  он  человек  идейный,  ответственный  и  видит  за  каждой  фамилией  –  пусть  вражье,  но  лицо,  переживая  «естественную  убыль»  как  урон  родному  государству;  после  вычеркивания  ему  «хочется  поскорее  вымыть  руки»,  ему-то  точно  не  смешно  и  не  весело:  на  него  возложено  бремя  «красноордынца»  –  властный  труд  пастыря,  муки  совести,  являющие  во  сне  лица.  Что  же  забавляет  автора? 

  Чтобы  никто  не  дай  бог  не  наступил  на  бабочку,  автор  беспечно  и  не  вдаваясь  в  подробности  вытаптывает  огромное  человеческое  поле,  с  линейной  легкостью  комендантского  карандаша  –  люди  жестко  переводятся  в  лица,  лица  –  в  строчки,  вычеркиваются  сотни,  остальные  топятся  в  ржавой  барже  и  позднее  вычеркиваются  тоже.  Взгляд  лишь  ненадолго  задерживается  на  них  –  и  отпускает.  Остается  горстка  проверенных,  безопасных,  интеллигентных,  необходимых  для  дальнейшего  повествования,  героев.  Да  и  что  бы  триста  человек  делали  без  провианта  в  холодной  зимней  тайге?  Наверняка  съели  бы  и  Зулейху,  и  новорожденного  Юзуфа,  а  может,  и  самого  коменданта  –  кто  знает?  Игнатов,  не  проплывайте  мимо,  тут  Зулейха  тонет,  а  вот  и  он  –  «уже  рядом,  помогает,  успокаивает…  Когда  выяснилось,  что  она  не  может  плыть  к  берегу,  не  стал  браниться  и  не  покинул  ее.  Он  ее  спас».  «Триста  ко  дну  пустил,  одну  вытащил  –  хорош  спаситель,  нечего  сказать». 

  И  не  только  это  коробит,  а  –  как  легко  умирать,  оказывается:  раз  –  и  все,  «через  два  на  ней  цветы  и  трава»…

  «Попытка  имитации  действительности»  нужна  лишь  для  того,  чтобы  на  костях  раскулаченных  махровым  цветом  расцвело  бессознательное  автора.  Пространство  текста  задается  классическими  архетипическими  структурами,  которые  в  полной  мере  помогают  раскрыться  главной  задаче  –  повествованию  романтической  истории  в  духе  Гюнтекина  –  на  потребу  публике,  с  той  лишь  разницей,  что  у  Г.  Яхиной  реальность  настолько  вынесена  за  скобки  персоны  Зулейхи,  что  от  нее  остается  только  предназначенная  для  иллюзиона  иллюзия,  и  никакие  мастерски  прописанные  детали,  никакие  ладони  и  мордочки  жеребят,  никакой  крупный  план  ее  не  рассеивают.

  Профанацию  действительности  поддерживает  и  «татарскость»,  старательно  придаваемая  тексту  с  помощью  навязчивой  синонимии,  но  –  увы!  –  тоже  не  составившая  контекста:  «Фэхишэ  –  проститутка»,  «Чыбылдык  –  занавеска»,  «Субхан  Алла!  –  Свят  Аллах!»,  «Юха  –  мифологическая  змея,  принимающая  облик  красивой  женщины»,  всего  56  названий.  Только  однажды  в  романе  промелькивает  что–то  похожее  на  настоящее  татарское:  «подступила  к  Юлбашу…  с  каждым  годом  становившаяся  все  страшнее,  как  албасты,  прожорливее,  как  дэв,  ненасытнее,  как  жалмавыз,  –  продразверстка».  Эта  умышленно  или  случайно  нарушенная  грамматика  могла  бы  стать  речевой  характеристикой  героини,  ничего  в  этом  зазорного  нет,  именно  так  идентифицируется  национальная  принадлежность  героев  испокон  веков  в  любой  литературе,  но  автор  лишает  Зулейху  дара  родной  речи.  Ее  мыслящая  немота  в  доме  мужа  достойна  сетевого  анекдота:  «Зулейхе  сложно  давались  длинные  русские  слова,  значения  которых  она  не  понимала,  поэтому  называла  всех  этих  людей  про  себя  –  красноордынцами».  На  поселении  по–татарски  она  не  говорит  –  не  с  кем,  кругом  питерские  интеллектуалы,  которые  в  конце  концов  довершают  дело:  притча  о  шах–птице  рассказывается  «улыму»  на  безупречном  литературном  русском  языке. 

 
  С  простодушием  Л.  Чарской  автор  отправляет  щупленькую  Зулейху  в  пургу  в  лес  рубить  (пилы  остались  дома  висеть  на  стене  сарая)  и  таскать  бревна  (не  чурки,  не  сутунки  –  бревна!),  тащить  неподъемного  мертвого  мужа  из  саней  до  постели,  в  дальнейшем  автор  доходит  и  до  убийства  единым  выстрелом  медведя  во  время  гона  (ибо  черника,  а  значит  –  начало  лета)  и  расстрела  на  месте  стаи  волков  в  зимнем  лесу.  Но  стоит  ли  корить  автора  за  это?  Метафизический  жанр  романа  все  стерпит.  Все  по  силам  маленькой  Зулейхе:  и  палкой  по  спине  –  совсем  не  больно,  не  берут  ее  ни  болезни,  ни  голод,  ни  холод,  ни  тяжелые  роды,  ни  – банально – усталость. 

Нет  никакого  испытания  обстоятельствами,  становления  характера.  Можно  сказать  лишь  о  «зооморфозах»  Зулейхи,  но  и  они  показывают,  что  она  всегда  неизменна.  С  их  помощью  автор  настойчиво  демонстрирует  нам  женскую  тварность  –  в  хорошем,  высшем,  божественном  смысле:  тварь  как  творение.  В  первой  главе  она  –  «мокрая  курица»,  которая,  естественно,  «не  птица»,  далее  –  она  барашек  в  овечье–человечьем  стаде,  везомом  поездом.  И  чем  далее  развивается  мотив  свободы  Зулейхи,  тем  более  зооморфен  ее  образ:  то  она  медведь,  за  которого  принял  ее  комендант  Игнатов,  то  как  собака  сворачивается  калачиком  на  нарах  вокруг  своего  детеныша,  то  –  «баба–змея»,  напугавшая  метким  выстрелом  уголовника  Горелова,  то,  «ползая  улиткой»,  собирает  ягоды  в  траве,  то  увязнувшая  в  меду  тайных  желаний  муха,  то  рыба  –  в  волнах  страсти. 

Эта  амбивалентная  животноподобность  (она  «курица»  –  ощипывает  кур  (тетеревов),  голова  в  овечье–человечьем  стаде  –  сама  везет  барашка  в  санях,  рыба  –  поселенцы  заготавливают  и  едят  рыбу,  медведь  –  убивает  медведя,  собака  –  расстреливает  волков)  дает  ей  ощущать  себя  «частью  этого  большого  и  сильного  мира,  каплей  в  зеленом  хвойном  море»,  где  смерть  –  везде,  где  смерть  «простая,  понятная»,  «тесно,  неразрывно  переплетена  с  жизнью  –  и  оттого  не  страшна».  «Как  бы  ни  бушевали  осенью  страшные  торфяные  пожары,  как  ни  была  бы  холодна  и  сурова  зима,  как  ни  свирепствовали  бы  оголодавшие  хищники,  Зулейха  знала:  весна  придет,  и  брызнут  юной  зеленью  деревья,  и  шелковая  трава  затопит  выжженную  некогда  дочерна  землю,  и  народится  у  зверья  веселый  и  обильный  молодняк.  Оттого  и  не  чувствовала  себя  жестокой,  убивая».  Таким  образом,  «смерть  с  радостью  помогает  жизни»,  а  значит,  все  –  слава  Аллаху!  –  нормально,  так  уж  в  природе  устроено,  и  поголовье  наше  восстановится,  «размножимся»,  заживем:  «через  три  она  снова  жива». 

  Через  такой  литературный  прием  мы  могли  бы  надеяться  увидеть  Зулейху  как  символ  женщины  –  в  смысле,  присущем  патриархальной  мусульманской  культуре,  т.е.  через  нее  увидеть  женщин  как  со-природных  братьев  меньших,  которых  лучше  бы  не  надо  бить  по  голове,  но  нет,  на  уровень  подобной  культурной  символики  она  не  вытягивает,  поскольку  резко  обособлена  не  только  от  смерти,  но  и  от  жизни:  от  всего  остального  мира  вообще,  а  в  особенности  –  от  мира  других  женщин,  скрупулезно  исключенных  автором  из  мира  прекрасного.  На  ком  ни  задерживается  взгляд  –  все  сплошь  «бесстыдницы»,  старухи  да  бабищи.  Чудовищная  Упыриха  и  бабка-марийка  Янипа.   «Вкусная»  Настасья:  «губы  –  брусникой,  щеки  –  яблоками.  В  седле  сидит  ровно,  высоко  подняв  голову  и  выставив  вперед  грудь  –  позволяет  собой  любоваться.  Даже  под  тулупом  видно:  такая  грудь  –  на  троих  бы  хватило.  Одно  слово  –  кровь  с  молоком»;  она  –  «пышнощекая  грудастая  баба»,  «тело  налитое,  упругое,  переливается  в  ладонях,  перекатывается,  так  и  хочется  сжимать,  сминать,  раскатывать»;  подлая  Груня:  «большая,  шумная,  коса  вокруг  головы  –  толщиной  с  руку,  а  сами  руки  –  толщиной  с  ногу,  Груня  тяжелой  солдатской  поступью  вошла  в  этот  дом»,  она  врывается  в  комнату  «шумно  и  неумолимо,  как  летящий  по  рельсам  паровоз»,  у  нее  «могучий  зад»,  «пышная  грудь»,  наличествуют  и  «филейные  части».  Остальные:  «Толстая  рыжая  бабища  из  шестого  вагона  с  большой  алой  родинкой  на  щеке…  крепкое,  жизненными  силами  дышащее  тело  не  спасло»  ее  от  смерти;  «грузной  печальной  кучей»  видим  мы  «дородную  жену  муллы,  любительницу  кошек»;  подруга  Изабелла:  «ее  большие  ноги  в  шнурованных  ботинках  ступают  решительно  и  неумолимо  –  доска  гнется,  дрожит»;  при  побеге  «одна  толстая  баба  застревает  в  узком  для  нее  проеме,  но  снизу  торопятся,  давят,  толкают  ждущие  своей  очереди  –  и  она  кое–как  пролезает,  обдирая  платье  и  тело,  оставляя  на  острых  щепах  нитки  и  куски  ткани»;  Аглая:  «коротковолосая  рыжая  шалава  с  острыми  грудками  и  крепким  задом,  туго  обтянутым  материей  слишком  узкого  платья»  –  ее  не  спасают  ни  «сливочная  кожа  пышного  бедра»,  ни  «тонкие  пальцы»,  с  такими  у  настоящих  мужиков  разговор  короткий:  башмаком  в  спину,  башмаком  под  зад:  «–  Слушай  сюда,  шлюха,  …Что  было  –  то  было.  Прошло!  Дом  мой  теперь  –  в  другом  месте.  Захочу  потоптать  –  вызову.  А  до  тех  пор  –  пшла!  Кругом  –  марш!  –  Глашкино  лицо  дергается,  рассыпается  крупными  морщинами  в  гримасу».  (В  этом  «Глашкином  лице»  (не  лице  Аглаи,  не  лице  женщины)  –  принимаемая  автором  позиция  отношения  к  ней  мужика:  Горелова,  облеченного  в  новенький  офицерский  мундир.)

Других  –  нет.

  Единственная  «баба»,  которая  могла  бы  соперничать  с  Зулейхой  за  истинные  чувства  Игнатова  –  Илона.  В  ней  нет  всеобщей  массивности  тяжелых  неповоротливых  «бабских»  членов,  у  нее  –  «другое:  мягкость,  нежная  вялость,  податливость,  но  все  одно  –  бабье  тело».  Но  –  если  так  подумать,  то  какая  же  она  нам  соперница?  У  нее  любовники  –  были?  Были:  «проплывали  через  ее  железную  кровать  с  блестящими  шариками  в  изголовье  и  через  ее  жизнь  –  не  оставляя  следа.  И  это  ничуть  ее  не  заботило».  Батюшки,  она  шлюха:  и  Игнатова  заносит  в  ее  жизнь  «шальным  ветром»!  Нет,  не  пара  она  ему,  не  пара.  И  сколько  ни  цеплялась  за  него  Илона  «во  всю  силу  бледных,  изможденных  в  постоянных  боях  с  клавишами  пальцев»,  сколько  ни  «хохотала,  высоко  закидывая  голову»  в  синематографе,  как  ни  «старалась  быть  страстной  и  неутомимой»,  ничего,  естественно,  не  помогло  –  ни  две  ничтожных,  пришитых  к  гимнастерке  пуговицы,  ни  «бабушкин  рецепт  приготовления  воскресных  оладушков».

  Опыт  построен  на  контрасте:  то  ли  дело  Зулейха!  Она  бесплотна:  «не  тело  –  воздух»,  дыхание  у  нее  «чистое,  как  у  ребенка», всю  ее  составляют  зеленые  глаза,  которые  она  не  устает  открывать,  очевидно,  проникая  взглядом  и  туда,  куда  не  проникает  даже  взгляд  Аллаха,  и  косы  –  символ  женской  привлекательности,  которые  сама  она  то  заплетает,  то  расплетает,  то  опять  заплетает,  и  за  которые  ее  притягивают  к  себе  муж  и  Игнатов.  Лишь  на  мгновение  показывается  на  глаза  Игнатову  налитое  яблочко  сладкой  кормящей  младенца  груди.  «Тело  ее  легко  и  послушно,  движения  быстры  и  точны;  она  сама  –  как  зверь,  как  птица,  как  движение  ветра,  течет  меж  еловых  лап,  сочится  сквозь  можжевеловые  кусты  и  валежник».  Она  умеет  «бесшумно  скользить,  едва  касаясь  земли;  не  примять  траву,  не  сломать  ветку,  не  сбить  шишку  –  не  оставить  ни  следа,  ни  даже  запаха;  раствориться  в  прохладном  воздухе,  в  комарином  писке,  в  солнечном  луче»,  не  ходит  –  летает,  и  все  ей  по  плечу:  работает  за  семерых  в  доме  мужа,  бревна  таскает,  в  чем  душа  держится  –  переживает  и  крепких  мужиков,  и  разных  «толстых  бабищ»,  и  ребенка  вынашивает,  и  охотится,  и,  и,  и  швец,  и  жнец  –  настоящая  труженица,  не  то  что  всякие  там  печатальщицы  в  конторах.

 
  Размышления  «статного,  видного,  идейного»  (это  и  все  о  герое,  дополняют  портрет  худощавость,  сапоги  и  прочая  амуниция)  Игнатова  о  бабах  и  Революции,  ниспосланные  ему  автором,  в  конце  концов  прекращаются  его  онемением  перед  фактом  страсти,  подлинной  любви  сами  понимаете  к  кому,  он  может  только  смотреть  на  нее  –  и  смотрит,  и  смотрит,  настигая,  наконец,  долгожданным  взглядом  Всевышнего:  «где–то  в  далекой  выси,  под  небесным  куполом  –  лицо,  обрамленное  нимбом  фуражки:  огненно–красный  околыш,  синяя  тулья.  Смотрит  на  нее.  Игнатов».

  Вне  своего  обмундирования,  которое  он  сбрасывает  как  старую  кожу  –  «китель,  галифе,  фуражка  –  все  по–щегольски  яркое,  свежее,  красуется  на  вбитом  в  стену  гвозде,  ровно  посредине.  Игнатов  ставит  вниз  натертые  ваксой  сапоги  –  и  картина  принимает  законченный  вид:  словно  из  него  самого  выпустили  воздух  и  повесили  на  всеобщее  обозрение  –  вот,  он,  мол,  наш  комендант,  полюбуйтесь»,  –  герой  остается  пустым,  апофатичным.  Его  единственная  литературно–архетипическая  задача  –  как  возлюбленного  убийцы  мужа  –  неотступно  следовать  за  Зулейхой,  присматривать  за  ней,  любить  ее.  Остальное  –  умещается  в  пределах  абзаца:  «Игнатов  перебирает  паспорта…  Люди,  люди,  люди  –  сотни  лиц  встают  перед  ним.  Он  был  тем,  кто  встречал  их  здесь,  на  краю  света.  Гнал  в  тайгу,  морил  непосильной  работой,  железной  рукой  выжимал  план,  издевался,  стращал,  предавал  наказанию.  Строил  для  них  дома,  кормил,  выбивал  продовольственный  фонд  и  лекарства,  защищал  от  центра.  Держал  на  плаву.  А  они  –  держали  его».

 
  Страна  утопает  в  крови  –  это,  оказывается,  «огромный  красный  слизень  невозмутимо  ползет  по  стене»,  а  «мудрый  усатый  муж  нежно  улыбается…  вслед».  Тюрьма  работает  «как  отменно  здоровое,  не  знающее  усталости  сердце»,  «без  перебоев»  перегоняющее  «кровь  большой  страны  с  запада  на  восток».  Вопрос  об  адекватности  цены  нового  освоения  Сибири  ставится  второстепенными  героями  романа,  и  странный  ответ  мы  получаем  на  него: 
  «–  И  вы  считаете  все  это,  –  Иконников  ведет  вокруг  стертой,  будто  обкусанной  с  боков,  железной  ложкой  с  винтом  закрученной  ручкой,  –  разумной  платой  за  возможность,  как  вы  выражаетесь,  выращивать  пшеницу?...
  –  Да  нет  же,  речь  совсем  не  о  том!  –  Сумлинский  ерзает  на  лавке,  мнет  в  ладошке  хлеб.  –  Ну  вот  вы,  Илья  Петрович,  что  по–настоящему  важного  создали  на  воле?  Двадцать  три  усатых  бюста?..
  –  И  сваяли  бы  еще  столько  же!  –  Константин  Арнольдович  грозно  стучит  ладошкой  об  стол…  –  А  здесь…  –  тот  не  может  успокоиться,  говорит  быстро,  громко.  –  Вы  же  Рафаэль!  Микеланджело!  Вы  же  не  клуб  расписываете  –  Сикстинскую  капеллу.  Вы  сами–то  это  понимаете?»

  Действительно,  люди–то,  наконец,  получили  работу  и  какую!  –  соответствующую  своему  истинному  предназначению,  т.е.  обрели  самих  себя  и  смысл  жизни. 

  Каждый  из  оставленных  в  живых  героев,  будь  он  представитель  профессии  или  национальности,  как  часть  своего  вида  страшно  одинок:  во  тьме  народу  один  художник,  один  повар,  один  охотник,  один  мальчик,  и  даже  урка  Горелов  –  одинокий,  а  потому  надоедливый,  но,  прямо  скажем,  не  особо  опасный  представитель  далекого  Уркестана.

  Собственно  героев–то  и  нет:  каждый  из  них  суть  набор  функций,  жестко  встроенный  в  повествование,  угодный  сюжету  мотив.  В  силу  авторской  потребности  в  них  они  принимают  роды,  лечат,  строят  землянки,  плетут  снегоступы,  готовят  еду,  расписывают  клуб  и  тут  же  отбрасываются  в  сторону.  В  самом  же  конце  романа  автор  просто  избавляется  от  них:  используя  такое  удобное  и  привычное  уже  будущее  время,  отправляет  их  в  мгновенную  смерть.  Остальные  люди  вообще  невидимы  –  какие–то  там  где–то  там  ударно  трудящиеся  массы:  много  из  ларца  одинаковы  с  лица.
 
  Подробно  же  прописанные  герои  –  в  частности,  доктор  Лейбе  –  совершенно  нежизненны.  Автор  живописует  его  столь  неуместно  подробно,  что  хочется  замахать  руками:  да  святой  он,  святой!  И  место  ему  –  в  раю,  где  он  и  пребывает  до  тех  пор,  пока  Зулейхе  не  пришло  время  рожать,  и  ясно,  что  нужен  он  был  только  потому,  что  без  него,  светила  медицины,  она  бы  не  разродилась.  Он  ее  спас.  Где–то  это  уже  было.  Причем,  где–то  уже  было  и  то,  что  в  дальнейшем  он  пригодился  и  как  архетипический  «мнимый  муж»,  дополнительно  ограждающий  героиню  от  внешнего  мира  и  не  покушающийся  на  невинность  героини.  Ах,  да  –  Гюнтекин,  «Королек  –  птичка  певчая».  Пожилой  добрый  доктор,  светило  в  аду  и  тоже  святой.

  Параллелью  создаваемой  иллюзии  реальности  в  романе  становится  и  ленинградский  художник  Илья  Иконников.  Он  рисует  на  потолке  клуба  четырех  ангелов  с  лицами  первых  поселенцев  (канонизируя,  таким  образом  «своих»  –  мать  Зулейху,  воина  Игнатова,  доктора  Лейбе  и  агронома  Сумлинского)  и,  продолжая  свой  благословенный  трудовой  путь,  в  промышленных  масштабах  поставляет  в  окрестные  клубы  и  библиотеки  изображения  упитанных  пионеров,  доярок  и  проч.  Правда,  по  ночам,  когда  никто  не  видит,  он  рисует  возлюбленный  и  далекий  Париж,  а  когда  приходит  инспекция  и  строго  спрашивает  его  «это  чё»,  он  остроумно  выдает  Париж  за  Москву,  и  инспекция,  натурально,  посрамленно  ретируется.  Более  того:  покинув  поселок,  уехав  на  фронт,  сквозь  сжатое  в  мимолетность  время  далекой  войны  Иконников  попадает  прямиком  в  Париж,  откуда  и  присылает  письму  сыну  Зулейхи  Юзуфу,  выманивая  его  на  Большую  землю. 
«Partir,  c’est  mourir  un  peu.  Уезжать  –  это  немножко  умирать»:  и  вот  уже  и  те,  кто,  казалось  бы,  уезжая,  спасаются,  косвенно  умерщвляются,  покидая  поле  зрения  героини.

  Следуя  изученной  в  процессе  чтения  логике  автора,  должен  умереть/уехать  и  Игнатов.  Да,  впрочем,  он  и  есть  мертвец:  вне  своих  властных  функций,  лишенный  должности  и  званий,  хромой  пожилой  алкоголик.  Он  ничего  не  умеет,  никогда  не  работал.  Возможно,  Зулейху  ждет  еще  один  трудовой  подвиг:  дохаживать  старика,  поскольку  она–то  –  все  еще  как  будто  15–30–летняя  девочка,  какой  появилась  на  первых  страницах  романа.  После  побега  сына  она  в  очередной  раз  «родилась»  –  к  очередной  новой  жизни,  которую,  надо  думать,  воспримет  с  таким  же  удовольствием  и  спокойствием,  как  и  весь  свой  путь,  ведущий  к  полному  освобождению  от  окружения. 

Удивительно,  но  автор  романа  следует  своей  неумолимой  логике  изживания  персонажей  и  в  реальной  жизни:  селебрити  легко  приносит  в  жертву  власти  славы  свою  прекрасную  зеленоглазую  героиню:  кому  же  еще  сыграть  ее  роль  в  фильме,  как  не  татарке  всея  Руси  –  Чулпан  Хаматовой?  Ведь  на  нее  точно  «все  пойдут»  смотреть  (а  потом  -  читать),  оттого  и  глаза  у  нее,  конечно,  и  больше,  и  зеленее,  чем  у  любой  безвестной  татарской  актрисы.  (Если  взглянуть  на  фотостенды  татарских  театров,  нетрудно  убедиться,  что  их  актрисы  длинноволосы  и  большеглазы,  а  красивы  –  и  впрямь  до  онемения.)

 
  Бесспорно,  образ  Зулейхи  апеллирует  к  классическому  образу  страны  как  женщины,  и  в  этом  смысле  роман  содержит  явный  уничижительно–воспитательный  аспект:  безусловная  пассивность,  обожествление  мужской  власти,  как  бы  страшна  и  мучительна  она  ни  была,  принятие  себя  в  этом  мире  как  существа  слабого,  вторичного,  несамостоятельного,  но  поддерживающего,  безропотно  подвластного  Всевышнему.

  Эпоха  «красного  террора»,  в  которую  происходит  действие  романа,  –  та  часть  нашей  истории,  которая  по  выходе  из  идеологического  затенения  предстала  перед  исследователями  и  публикой  во  всей  своей  чудовищной  наготе  и  была  справедливо  оценена  как  одно  из  многих  кровавых  безумств  и  преступлений  Советской  власти.  Но  все  проходит:  кровавая  подноготная,  тень,  которую  отбрасывал  Союз  ССР,  заставившая  общество  произвести  переоценку  ценностей,  а  авторов  искать  художественные  выразительные  средства  для  сопереживания  горю  народов,  попавших  в  мясорубку  режима,  постепенно  истаивает.  Мы  понемногу  привыкаем  к  дыханию  преисподней  из  архивов  и  книг,  и  вот,  выход  из  «языкового  тупика»  будто  бы  найден:  «Зулейха  открывает  глаза»  уже  вообще  вне  сферы  реализма,  призвав  к  служению  и  едва  не  позабытого  героя  М.  Шолохова  на  новый  лад  поднимать  опущенную  было  скорбным  познанием  целину. 

  Роман  наглядно  демонстрирует,  как  преодолевается,  изживается  жанр  литературы  мученичества,  по  возможности  поведавшей  о  самых  болевых,  травмирующих  событиях  начала  ХХ  века,  как  эта  тема  в  отечественной  литературе  постепенно  беллетризируется,  мифологизируется  и  на  наших  глазах,  как  это  ни  странно,  как  ни  страшно,  снова  переходит  в  жанр  массово–развлекательный,  почти  сказочный,  киношный.
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Комментарии (1)

  • Андрей Никитин
    13.06.2017 20:22 Андрей Никитин
    Под Вашим освещением, этот роман увиделся в другом свете. Спасибо
    1
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